वर्चुअल सुनवाई की यह प्रक्रिया 20 फरवरी से होगी प्रभावी
लखनऊ, 13 फरवरी। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा टैक्स प्रणाली को सरल बनाने व तकनीकी का अधिक से अधिक उपयोग करते हुए Ease of doing business को बढ़ावा देने का निर्देशों के क्रम में उत्तर प्रदेश में राज्य कर विभाग द्वारा बड़े करदाताओं को सुविधा प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम उठाया गया है। राज्य कर विभाग द्वारा प्रदेश के बड़े करदाताओं के लिये वर्चुअल सुनवाई की व्यवस्था लागू किए जाने से समस्याओं का प्रभावी समाधान होगा। इससे न्याय निर्णयन की प्रक्रिया तेज़, पारदर्शी, समयबद्ध और करदाता-हितैषी बनेगी। संयुक्त आयुक्त (कारपोरेट) एवं संयुक्त आयुक्त (कारपोरेट सेल-ऑयल सेक्टर) स्तर पर लागू होने वाली वर्चुअल सुनवाई की यह प्रक्रिया 20 फरवरी से प्रभावी होगी।
यह जानकारी देते हुए शासन में प्रमुख सचिव, राज्य कर कामिनी रतन चौहान ने बताया कि इस पहल के अंतर्गत प्रदेश के सभी संयुक्त आयुक्त (कारपोरेट) एवं संयुक्त आयुक्त (कारपोरेट सेल-ऑयल सेक्टर) स्तर पर पंजीकृत करदाताओं की व्यक्तिगत सुनवाई को सामान्य परिस्थितियों में अनिवार्य रूप से वर्चुअल सुनवाई के रूप में आयोजित किया जाएगा। यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश माल एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 की विभिन्न धाराओं के अनुरूप होगी।
प्रमुख सचिव, राज्य कर, श्रीमती चौहान ने बताया कि प्रदेश में पंजीकृत बड़े करदाताओं की न्याय निर्णयन से जुड़ी व्यक्तिगत सुनवाई अब वर्चुअल सुनवाई से की जाएगी। बड़े करदाताओं के सहूलियत को ध्यान में रखते हुए यह विकल्प भी उपलब्ध कराया जाएगा कि अगर किसी कारण से वर्चुअल सुनवाई के स्थान पर करदाता खुद अथवा अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से अधिकारी के सामने उपस्थित होकर सुनवाई कराना चाहें तो उनके प्रार्थना पत्र पर विचार कर उनको यह अवसर भी अधिकारी द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा।आयुक्त, राज्य कर, उत्तर प्रदेश डॉ. नितिन बंसल ने बताया कि राज्य कर विभाग में कारपोरेट सर्किल का गठन बड़े करदाताओं को बेहतर और सुगम सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया है। वर्तमान में जीएसटी से संबंधित कार्यवाहियों ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से की जा रही हैं, लेकिन न्याय निर्णयन के कतिपय मामलों में करदाताओं को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए कार्यालय में उपस्थित होना पड़ता था। भौतिक सुनवाई की इस प्रक्रिया में कई बार करदाता या उनके अधिकृत प्रतिनिधि समय पर उपस्थित नहीं हो पाते थे, जिससे स्थगन लेना पड़ता था। कभी-कभी नियत तिथि पर अधिकारी के अवकाश पर होने से भी त्वरित न्याय प्रदान करने की विभागीय मंशा प्रभावित होती थी। इससे न केवल मामलों के निस्तारण में देरी होती थी, बल्कि करदाता और विभाग-दोनों का समय, श्रम और संसाधन भी अनावश्यक रूप से खर्च होते थे।
Author: Chautha Prahari
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