शंकराचार्य रूपी चारों स्तम्भों के मध्य गोरक्षनाथ परंपरा के सूर्य का अखंड तेज
(रीना एन सिंह)
सनातन परंपरा में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख शंकराचार्य मठ श्रृंगेरी शारदा पीठ, द्वारका शारदा पीठ, गोवर्धन मठ पुरी और ज्योतिर्मठ चारों दिशाओं में वैदिक ज्ञान, अद्वैत दर्शन और संस्थागत संरचना के प्रसार हेतु स्थापित किए गए वहीं दूसरी ओर नाथ पंथ की परंपरा में गोरखनाथ मठ एक ऐसी अद्वितीय, केंद्रित और जीवंत आध्यात्मिक धुरी के रूप में प्रतिष्ठित है, जो संख्या में एक होते हुए भी साधना, तप, गुरु-शिष्य परंपरा, सामाजिक जागरण और संघर्षशील विरासत के कारण व्यापक प्रभाव रखती है | जहाँ शंकराचार्य पीठों का उद्देश्य धर्म को दार्शनिक रूप से एकीकृत करना था, वहीं गोरक्षनाथ पीठ ने धर्म को प्रत्यक्ष अनुभव, योग-साधना, शिव-शक्ति उपासना और जन-आधारित शक्ति के रूप में जीवित रखा और इसकी विशिष्टता इस तथ्य में भी निहित है कि यहाँ पीठाधीश्वर का पद किसी वसीयत या सांसारिक अधिकार से नहीं, बल्कि कठोर तपस्या, आध्यात्मिक पात्रता और अखंड गुरु-शिष्य परंपरा से प्राप्त होता है, नाथ परंपरा की जड़ें अत्यंत प्राचीन शैव, तांत्रिक और योगिक धाराओं में मानी जाती हैं, जिनके आदि गुरु के रूप में मत्स्येन्द्रनाथ का उल्लेख मिलता है, जबकि गुरु गोरखनाथ (लगभग 9वीं–12वीं शताब्दी) ने इस परंपरा को संगठित, व्यापक और जन-आधारित स्वरूप दिया, हठयोग, कुंडलिनी और प्रत्यक्ष साधना को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाया तथा गोरखनाथ मठ जैसी पीठों को जीवंत आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया, इसके विपरीत आदि शंकराचार्य (लगभग 10वीं शताब्दी) के समय जब वैदिक धर्म विभिन्न मतों के कारण बिखराव की स्थिति में था, अद्वैत वेदांत को पुनर्जीवित किया और भारत के चारों दिशाओं में स्थापना कर सनातन धर्म को दार्शनिक और संस्थागत एकता प्रदान की | नाथ परंपरा का मूल शिव-शक्ति के प्रत्यक्ष अनुभव में निहित है, इसलिए इसका गहरा संबंध केदारनाथ धाम, बद्रीनाथ धाम, सोमनाथ मंदिर, पशुपतिनाथ मंदिर और बैद्यनाथ धाम जैसे ज्योतिर्लिंग एवं शिव-शक्ति केंद्रों से रहा है, जहाँ नाथ योगियों की साधना, तपस्या और उपस्थिति ऐतिहासिक रूप से मानी जाती है; मध्यकालीन आक्रमणों विशेषकर मुगल काल में जब मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं पर संकट आया तब नाथ योगी केवल ध्यानमग्न साधक नहीं रहे बल्कि योद्धा-संन्यासी बनकर धर्म, संस्कृति और तीर्थों की रक्षा के लिए खड़े हुए और अनेक अवसरों पर अपने प्राणों का बलिदान दिया, जिससे यह परंपरा केवल आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि रक्षक शक्ति के रूप में स्थापित हुई, जबकि उसी काल में शंकराचार्य परंपरा ने अपने मठों के माध्यम से वेद, उपनिषद और शास्त्रीय ज्ञान की परंपरा को संरक्षित रखा, आगे चलकर 1947 के विभाजन के समय जब धार्मिक और सांस्कृतिक संकट गहरा था, तब नाथ पीठों ने समाज को संगठित रखने में भूमिका निभाई और आधुनिक काल में राम मंदिर अयोध्या आंदोलन में गोरक्षनाथ पीठ से जुड़े संतों की सक्रिय भागीदारी ने यह सिद्ध किया कि यह परंपरा केवल ऐतिहासिक नहीं बल्कि वर्तमान में भी प्रभावशाली और सक्रिय है तथा कभी भी पीठाधीश्वर के पद की गरिमा पर मुहर लगाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया , गोरखनाथ की योग, हठयोग और कुंडलिनी साधना परंपरा ने इसे व्यवस्थित स्वरूप दिया, यही नाथ परंपरा उत्तर भारत में केदारनाथ धाम, बद्रीनाथ धाम, सोमनाथ मंदिर और नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर जैसे शिव-शक्ति केंद्रों से जुड़ी साधना परंपराओं के रूप में गहराई से दिखाई देती है, जहाँ नेपाल विशेष रूप से नाथ योगियों की साधना, शिव उपासना और हिमालयी तपोभूमि का महत्वपूर्ण विस्तार क्षेत्र माना जाता है, वहीं दक्षिण भारत में यह धारा कर्नाटक के मंगलौर और गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर जैसे शिव क्षेत्रों में शैव-योगिक प्रभाव के रूप में, तमिलनाडु में चिदंबरम नटराज मंदिर और अरुणाचलेश्वर मंदिर या अन्नामलैयार मंदिर में सिद्ध और आत्म-ज्ञान परंपरा के रूप में तथा आंध्र प्रदेश में श्रीशैलम मल्लिकार्जुन मंदिर जैसे ज्योतिर्लिंग केंद्रों में तांत्रिक-योगिक मिश्र रूप में दिखाई देती है, इसके अतिरिक्त दक्षिण-पूर्व एशिया में यह शैव और योगिक प्रभाव सांस्कृतिक रूप से कंबोडिया के अंकोरवट और विशेषकर प्रेह विहार मंदिर जैसे प्राचीन शिव-हिंदू मंदिरों में ऐतिहासिक रूप से देखा जाता है, जहाँ भारतीय शैव परंपरा, शिव उपासना और योगिक प्रतीकों का प्रभाव प्राचीन खमेर सभ्यता में समाहित हुआ, नाथ परंपरा मूलतः गोरखपुर नाथ पंथ से जुड़ी एक संगठित योगिक धारा होकर भी केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि नेपाल और कंबोडिया जैसे क्षेत्रों तक इसका सांस्कृतिक-आध्यात्मिक प्रभाव फैलता गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह परंपरा एक क्षेत्रीय नहीं बल्कि व्यापक हिमालय से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैली हुई शैव-योगिक सभ्यता-धारा है। वहीं यह भी कहा जाता है कि किसी भी शंकराचार्य को भारत भूमि से जाना वर्जित है, योगी आदित्यनाथ जी के गुरु ब्रह्मलीन राष्ट्रीय संत महंत अवैद्यनाथ जी ने तमिल नाडु के मीनाक्षीपुरम से सामाजिक समरसता का सन्देश दिया, उन्होने धर्मांतरण के खिलाफ आवाज उठाई तथा पिछड़ी जाति तथा अनुसूचित वर्ग के अधिकारों को सुरक्षित करते हुए ऐसे जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किये जिससे गोरक्षनाथ पीठ का सम्मान और पहचान न केवल उत्तर भारत अपितु दक्षिण भारत मे भी है, महंत अवैद्यनाथ जी के तमिलनाडु पहुंचने के सदियों पहले से ही दक्षिण भारत मे गोरखनाथ मठ की जड़ें विद्यमान हैं। लोककथाओं में राजा भर्तृहरि बहुत प्रसिद्ध है, जो उज्जैन के राजा था एवं महान राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। राजा भर्तृहरि संस्कृत के महान् कवि थे, जो अपना राज्य अपने भाई को सौंप कर नाथ पंथी योगी बन गए, भर्तृहरि को गोरख वंश के महान योगी में गिना जाता है। इनकी कहानियाँ बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान में लोकप्रिय है। छतीसगढ़ राज्य में रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवद्गीता की तरह ही भर्तृहरि चरित भी काफी प्रचलित है। यह कथा गांवों में बुजुर्गों के मुख से पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित हो रही है। राजा भर्तृहरि तमिल नाडु के महान नाथ योगी पट्टीनाथ जिन्हे तमिल भाषा मे ‘पट्टिनाथर’ कहा जाता है (स्वेथरन्यार या पट्टीनाथु चेट्टियार, पूमपुहार, तमिलनाडु के इस संत का पूर्वाश्रम नाम है) के शिष्य बन गए और अंत मे कालाहस्ती मंदिर में मुक्ति (मोक्ष) को प्राप्त किया। दक्षिण भारतीय भाषाओं मे गोरखनाथ पीठ को कोरक्का सिद्धार भी कहा जाता है (देवनागरी: गोरखखर) जो 18 सिद्धारों में से एक है और नवनाथर के बीच गोरखनाथ के नाम से भी जाना जाता है, श्री अगत्तियार उनके गुरु थे, जिनकी समाधि तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के वडुकुपोइगनल्लूर में है। एक वृत्तांत के अनुसार, उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा कोयंबटूर के वेल्लियांगिरी पर्वत में बिताया। गोरखनाथ पीठ यानी कोराक्कर से संबंधित अन्य गर्भगृह पेरूर, तिरुचेंदूर और त्रिकोनमल्ली मे हैं। कोराक्कर के कुछ सिद्ध मंदिर तथा गुफाएँ चतुरगिरि और कोल्ली पहाड़ियों में पाई जाती हैं। इस समग्र विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जहाँ शंकराचार्य परंपरा ने सनातन धर्म को दार्शनिक आधार और वैदिक संरचना प्रदान की, वहीं नाथ परंपरा और गोरक्षनाथ पीठ ने धर्म को जीवंत अनुभव, जन-आधारित साधना, संघर्ष और रक्षा की शक्ति प्रदान की और दोनों मिलकर ही सनातन धर्म की पूर्णता को स्थापित करते हैं, किंतु नाथ परंपरा की विशेषता यह है कि उसने हर युग में धर्म को केवल समझाया नहीं, बल्कि उसे जीया, बचाया और समाज में स्थापित किया।
(लेखिका सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता व नाथ संप्रदाय की विशेषज्ञ हैं)

Author: Chautha Prahari
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