लखनऊ,01 मार्च।
‘झोला छाप डॉक्टर’—नाम भले बाजारू और अटपटा लगे, लेकिन हकीकत यह है कि गांवों की जिंदगी में इनकी मौजूदगी एक कड़वी सच्चाई है। अगर सिर्फ उत्तर प्रदेश की बात करें तो प्रदेश में लगभग 1,06,000 ग्राम पंचायतें और हजारों नगरीय वार्ड हैं। मोटे अनुमान से देखें तो करीब 50,000 से अधिक तथाकथित झोला छाप चिकित्सक सक्रिय हो सकते हैं।
आखिर करते क्या हैं ये?
गांव के किसी सुदूर इलाके में रात के वक्त—
अचानक तेज बुखार
पेट दर्द
उल्टी-दस्त
चोट-चपेट
ऐसी स्थिति में पहला दरवाजा अक्सर इन्हीं के यहां खुलता है।
जहां बड़े अस्पतालों में सुसज्जित बेड पर ड्रिप चढ़ती है, वहीं गांवों में खटिया या तख्त पर बांस या दीवार के सहारे वही ड्रिप टांग दी जाती है। प्राथमिक उपचार, दवा और सबसे अहम—मरीज को भरोसा—ये सब तुरंत मिलता है।
जब केस गंभीर हो…
कई मामलों में ये ग्रामीण चिकित्सक खुद मान लेते हैं कि मामला उनके बस का नहीं है। तब वे शहर के बड़े अस्पताल या डॉक्टर से संपर्क कर मरीज को रेफर भी करते हैं और भर्ती कराने में मदद करते हैं।
सवाल यहां है…
क्या ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त सरकारी डॉक्टर और संसाधन हैं?
क्या हर गांव में 24 घंटे सरकारी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध है?
जमीनी सच्चाई यह है कि आबादी और बीमारियों के बढ़ते दबाव के मुकाबले ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचा अभी भी कमजोर है। ऐसे में ये अवैध माने जाने वाले चिकित्सक ही तात्कालिक संकटमोचक बन जाते हैं।
समाधान क्या हो?
सिर्फ क्लीनिक सील करना या कार्रवाई की खबरें चलाना समस्या का स्थायी हल नहीं है।
जरूरत है—
सरकार इनको बुनियादी प्रशिक्षण दे
“चिकित्सा मित्र” या अन्य नाम से सीमित अधिकारों के साथ वैध ढांचा तैयार करे
ग्रामीण क्लीनिकों का पंजीकरण और अपग्रेडेशन हो
प्राथमिक उपचार तक सीमित स्पष्ट नियम बनाए जाएं
जब लोग बड़े संस्थानों—जैसे Postgraduate Institute of Medical Education and Research (PGI) या All India Institute of Medical Sciences (AIIMS)—में भी जीवन-मृत्यु की जंग हार जाते हैं, तो गांवों में सीमित संसाधनों के बीच काम कर रहे लोगों पर पूरी जिम्मेदारी डालना भी उचित नहीं।
मूल मुद्दा समझना होगा
ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की खाई को पाटे बिना ‘झोला छाप’ पर शिकंजा कसना अधूरा कदम है। अवैध को वैध बनाने के व्यावहारिक रास्ते तलाशने होंगे—ताकि गांवों को प्राथमिक चिकित्सा का सुरक्षित और प्रशिक्षित विकल्प मिल सके।

Author: Chautha Prahari
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