लखनऊ, 27 मार्च।राम मंदिर को लेकर एक बयान ने सियासी और धार्मिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। विवादित शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बयान पर अब तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। अधिवक्ता, लेखक और पत्रकार सौरभ सोमवंशी ने न सिर्फ इस बयान का विरोध किया, बल्कि इसे “इतिहास के साथ अन्याय” करार दिया।
सौरभ सोमवंशी ने अपनी पुस्तक “गोरखनाथ मठ: भारत की राजनीति एवं सामाजिक समरसता का केंद्र बिंदु” अविमुक्तेश्वरानंद को भेजते हुए कहा कि तथ्यों को समझे बिना ऐसे बयान देना उचित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राम मंदिर आंदोलन केवल एक घटना नहीं, बल्कि दशकों का संघर्ष है, जिसमें गोरखनाथ मठ की केंद्रीय भूमिका रही है।

विवाद की शुरुआत उस बयान से हुई, जिसमें योगी आदित्यनाथ के योगदान को नकारा गया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सोमवंशी ने कहा कि गोरखनाथ पीठ का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम से भी पहले का है और राम मंदिर के लिए उसका संघर्ष लंबा और सतत रहा है।
इतिहास के पन्नों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 22 दिसंबर 1949 की रात, जब अयोध्या में रामलला का प्राकट्य हुआ, उस समय महंत दिग्विजय नाथ वहां मौजूद थे। वहीं से इस पूरे विवाद की कानूनी लड़ाई की नींव पड़ी।
इसके बाद 1986 में विवादित परिसर का ताला खुलवाने में महंत अवेद्यनाथ की भूमिका को भी उन्होंने निर्णायक बताया। सोमवंशी के अनुसार, यह केवल धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि सामाजिक समरसता का भी एक बड़ा अभियान था।
उन्होंने 1989 के शिलान्यास का जिक्र करते हुए कहा कि दलित समाज के कामेश्वर चौपाल से पहली ईंट रखवाना उस समय एक ऐतिहासिक और सामाजिक संदेश था—कि यह आंदोलन सभी वर्गों का है।
सौरभ सोमवंशी ने अपनी पुस्तक का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों—इलाहाबाद विश्वविद्यालय, गोरखपुर विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय—के विद्वानों के विचार शामिल हैं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह सहित कई बुद्धिजीवियों ने भी गोरखनाथ मठ और उसके महंतों के योगदान को रेखांकित किया है।
उन्होंने कहा कि गोरखनाथ मठ ने न केवल राम मंदिर आंदोलन को दिशा दी, बल्कि दलितों, पिछड़ों और समाज के वंचित वर्गों के उत्थान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2017 के बाद के दौर का जिक्र करते हुए सोमवंशी ने कहा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ की पहल से अयोध्या में दीपोत्सव जैसे आयोजनों ने इस आंदोलन को नई पहचान दी। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि राज्य सरकार की सक्रिय पैरवी का ही परिणाम था कि सुप्रीम कोर्ट से फैसला हिंदुओं के पक्ष में आया।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि राम मंदिर आंदोलन के इतिहास को किस नजरिए से देखा जाए। जहां एक ओर बयानबाजी से विवाद बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर ऐतिहासिक तथ्यों और दस्तावेजों के जरिए अपने-अपने पक्ष को मजबूत करने की कोशिश भी जारी है।
फिलहाल यह मामला केवल बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह इतिहास, आस्था और राजनीति—तीनों के संगम पर खड़ा एक बड़ा विमर्श बन चुका है।
Author: Chautha Prahari
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