लखनऊ, 27 मार्च।उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और लोकभाषाओं के संरक्षण को लेकर राजधानी लखनऊ में एक महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली, जहां एसआर इंजीनियरिंग कॉलेज, बीकेटी में राष्ट्रीय अवधी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन अवध भारती संस्थान उत्तर प्रदेश, भारतीय भाषा संस्थान मैसूर (कर्नाटक) एवं एसआर ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पाँच दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के अंतर्गत हुआ।

कार्यशाला के तीसरे दिन राजदेवी सभागार में आयोजित इस संगोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि सदस्य विधान परिषद पवन सिंह चौहान ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि “अवधी भाषी कभी उद्दंड नहीं होते हैं, बल्कि यह भाषा अपने आप में सौम्यता और संस्कृति का प्रतीक है।” उन्होंने बताया कि अवधी भाषा में व्यावसायिक पाठ्यक्रम विकसित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है, जिससे इस भाषा को रोजगारपरक बनाया जा सके।
पवन सिंह चौहान ने अवधी के पारंपरिक खानपान का भी उल्लेख करते हुए कहा कि “हमारे सभी त्योहारों में बनने वाले अवधी व्यंजन मौसम के अनुरूप होते थे, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक थे।” उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार अवधी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए हर संभव कदम उठाएगी।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता भारतीय भाषा संस्थान मैसूर, कर्नाटक के समन्वयक डॉ. सत्येन्द्र अवस्थी ने “अवधी भाषा प्रौद्योगिकी संरक्षण एवं संवर्धन” विषय पर विस्तार से व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि यदि अवधी भाषा को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, विशेषकर गूगल जैसी तकनीकी प्रणालियों में शामिल करना है, तो इसके लिए गद्य साहित्य का सृजन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने अवधी में अनुवाद कार्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अवध भारती संस्थान उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. राम बहादुर मिश्र ने कहा कि अवधी भाषा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है और इसकी जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं। उन्होंने सभी विद्वानों और युवाओं से आग्रह किया कि वे अवधी में लेखन प्रारंभ करें, ताकि इस भाषा को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सके।
विशिष्ट अतिथि के रूप में केएमसी भाषा विश्वविद्यालय लखनऊ के मुख्य कुलानुशासक एवं अवधी शोधपीठ के समन्वयक डॉ. नीरज शुक्ला ने कहा कि अवधी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि जीवनशैली है। इसमें भाव, भोजन, भक्ति और संस्कृति का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने लोकगीत, लोकत्योहार और पारंपरिक व्यंजनों के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की है।
कार्यक्रम का संचालन संयोजक नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान ने किया। इस दौरान अवधी भाषा के 12 विशिष्ट विद्वानों की बोली की रिकॉर्डिंग भी की गई, जो भविष्य में भाषा संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में उपयोगी साबित होगी।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। मुख्य अतिथि द्वारा सभी को मां चन्द्रिका देवी का चित्र एवं बैग भेंट कर सम्मानित किया गया। इस संगोष्ठी में प्रदीप सारंग, कुसुम वर्मा, संजोली पाण्डेय, काजल सिंह, रजनी वर्मा, ज्योति किरण रतन, डॉ. अर्जुन पाण्डेय, प्रवीण पाण्डेय, संदीप अनुरागी, हिमांशु श्रीवास्तव, देवेंद्र कश्यप ‘निडर’, कृष्णा प्रजापति सहित लगभग तीन दर्जन विद्वानों ने सहभागिता की।
यह संगोष्ठी न केवल अवधी भाषा के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई, बल्कि इसने यह भी स्पष्ट किया कि लोकभाषाओं को आधुनिक तकनीक और शिक्षा से जोड़कर ही उन्हें भविष्य में जीवित रखा जा सकता है।
Author: Chautha Prahari
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