वैश्विक महाशक्तियों के संघर्ष के बीच अपने राष्ट्रीय हित पर अडिग नया भारत
✍️ रीना एन सिंह
वैश्विक राजनीति की दुनिया में एक पुरानी कहावत अक्सर दोहराई जाती है—“दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।” पहली नजर में यह विचार व्यावहारिक प्रतीत होता है, लेकिन इतिहास और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का गहन अध्ययन बताता है कि यह केवल आधा सच है। वास्तविकता कहीं अधिक जटिल, बहुआयामी और संवेदनशील है।
अक्सर इसी सोच के कारण छोटे और मध्यम शक्ति वाले देश महाशक्तियों के संघर्ष में इस तरह उलझ जाते हैं कि उनकी अपनी सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और आंतरिक स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहाँ महाशक्तियों के बीच बढ़ते तनाव ने पश्चिम एशिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। दुबई जैसे विकसित और सुरक्षित माने जाने वाले वैश्विक शहर भी इस अनिश्चितता से अछूते नहीं हैं।
विश्व राजनीति के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जब महाशक्तियों ने अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे देशों की भूमि, संसाधनों और सैन्य ठिकानों का उपयोग किया। पश्चिम एशिया इसका प्रमुख उदाहरण है, जहाँ कई देशों की जमीन पर विदेशी सैन्य अड्डे स्थापित किए गए और उनका उपयोग क्षेत्रीय संघर्षों में किया गया।
जब किसी महाशक्ति द्वारा किसी तीसरे देश के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की जाती है, तो वह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहता। युद्ध किसी और का होता है, रणनीति किसी और की होती है, लेकिन उसके परिणाम—सुरक्षा खतरे, आर्थिक दबाव और अस्थिरता—उस देश को झेलने पड़ते हैं जिसकी भूमि का उपयोग किया गया होता है।
इस स्थिति का सबसे बड़ा प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है। विशेष रूप से वे लोग जो विदेशों में काम करते हैं, अचानक वैश्विक तनाव के बीच असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। युद्ध या सैन्य तनाव की स्थिति में यात्रा प्रतिबंध, रोजगार अस्थिरता, सामाजिक तनाव और जीवन के खतरे जैसी चुनौतियाँ सामने आती हैं।
भारत के संदर्भ में यह विषय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि लाखों भारतीय नागरिक विदेशों में कार्यरत हैं, खासकर खाड़ी देशों में। ये प्रवासी भारतीय न केवल वहाँ की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे हर वर्ष बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा (रेमिटेंस) भारत भेजते हैं।
ऐसे समय में भारत की विदेश नीति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ने स्वतंत्रता के बाद से ही “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) को अपनी कूटनीति का आधार बनाया है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से भारत ने स्पष्ट किया था कि वह किसी भी महाशक्ति के प्रभाव में आकर निर्णय नहीं लेगा, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा।
आज का वैश्विक परिदृश्य तेजी से बहुध्रुवीय (Multipolar) व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, जहाँ अमेरिका, चीन, रूस, यूरोप और अन्य शक्तियाँ अपने-अपने प्रभाव को बढ़ाने में लगी हैं। इस स्थिति में कई देशों पर दबाव होता है कि वे किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह खड़े हों। लेकिन भारत का दृष्टिकोण संतुलन, व्यावहारिकता और स्वतंत्र निर्णय पर आधारित है।
भारत विभिन्न देशों के साथ सहयोग करता है, लेकिन अपने निर्णय केवल राष्ट्रीय हित और दीर्घकालिक रणनीतिक संतुलन को ध्यान में रखकर लेता है। यही नीति उसे वैश्विक मंच पर एक विश्वसनीय और जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है।
इसके साथ ही आर्थिक आत्मनिर्भरता का महत्व भी बढ़ गया है। आधुनिक वैश्विक राजनीति में केवल सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूती, तकनीकी विकास और ऊर्जा सुरक्षा भी उतने ही निर्णायक कारक हैं। यदि कोई देश आर्थिक रूप से सशक्त है, तो वह अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद स्वतंत्र नीति अपनाने में सक्षम रहता है।
भारत की “आत्मनिर्भर भारत” पहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था का सक्रिय भागीदार बनाना है, लेकिन साथ ही आवश्यक क्षेत्रों में बाहरी निर्भरता को कम करना भी है।
अंततः वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यही है कि न तो स्थायी मित्र होते हैं और न ही स्थायी शत्रु—केवल स्थायी राष्ट्रीय हित होते हैं। इसलिए किसी भी राष्ट्र को अपनी विदेश नीति भावनाओं या तात्कालिक गठबंधनों के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के आधार पर बनानी चाहिए।
भारत जैसे उभरते राष्ट्र के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि “दुश्मन का दुश्मन” हमेशा मित्र नहीं होता—विशेषकर तब, जब इसकी कीमत देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा से चुकानी पड़े।
नया भारत इस सच्चाई को भली-भाँति समझता है। आज भारत केवल वैश्विक राजनीति का दर्शक नहीं, बल्कि एक संतुलित, आत्मविश्वासी और जिम्मेदार शक्ति के रूप में उभर रहा है। उसकी नीति स्पष्ट है—राष्ट्रहित सर्वोपरि, रणनीतिक स्वायत्तता अनिवार्य और आर्थिक आत्मनिर्भरता ही वास्तविक वैश्विक शक्ति का आधार है।
साथ ही यह सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है कि दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, सम्मान और विश्वास भारत की कूटनीति की सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल रहे। क्योंकि उभरते भारत की असली शक्ति केवल उसकी सीमाओं में नहीं, बल्कि दुनिया भर में बसे उसके नागरिकों के विश्वास और सुरक्षा में निहित है।
(रीना एन सिंह, सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता, इंग्लैंड एवं वेल्स की सॉलिसिटर तथा अंतरराष्ट्रीय व राजनीतिक मामलों की विशेषज्ञ हैं।)
Author: VINAY PRAKASH SINGH
Registration NO. UDYAM -UP-24-0043854






