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कोविड संकट में उम्मीद की मिसाल बनी ‘देवदूत वानर सेना, हजारों अजनबियों ने मिलकर बचाईं जिंदगियां

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कोविड संकट में उम्मीद की मिसाल बनी ‘देवदूत वानर सेना, हजारों अजनबियों ने मिलकर बचाईं जिंदगियां

 डॉ अमित राय 

कोरोना महामारी के कठिन दौर में जब लोग अस्पतालों, ऑक्सीजन और दवाइयों के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब समाज के भीतर से एक ऐसी पहल सामने आई जिसने मानवता की नई मिसाल कायम की। “देवदूत वानर सेना” नाम का यह सामाजिक अभियान कोविड-19 के दौरान जरूरतमंद लोगों के लिए सहारे का बड़ा माध्यम बना। इस अभियान ने सोशल मीडिया, डिजिटल भुगतान और आम लोगों की संवेदनशीलता को जोड़कर हजारों परिवारों तक मदद पहुंचाई।

कोविड काल में डिजिटल माध्यम से जरूरतमंदों की सहायता करते स्वयंसेवकों का प्रतीकात्मक चित्र
वर्ष 2020 और 2021 का कोविड काल देश और दुनिया के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। अस्पतालों में भीड़ थी, ऑक्सीजन की कमी थी और लोग अपने परिजनों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे। ऐसे समय में कई नागरिकों ने आगे आकर जरूरतमंदों की मदद का बीड़ा उठाया। इन्हीं प्रयासों से “देवदूत वानर सेना” का जन्म हुआ।
इस अभियान की प्रेरणा उपनिदेशक पिछड़ा वर्ग कल्याण अजीत प्रताप सिंह से मिली। यह किसी सरकारी योजना का हिस्सा नहीं था और न ही कोई पंजीकृत संस्था थी। इसका कोई कार्यालय या स्थायी कोष नहीं था। इसकी असली ताकत लोगों का भरोसा, सहयोग की भावना और सोशल मीडिया का नेटवर्क था।
फेसबुक, व्हाट्सएप और यूपीआई जैसे डिजिटल माध्यमों के जरिए सहायता जुटाई गई। कोई 100 रुपये का सहयोग देता था, कोई 500 या 1,000 रुपये का। कई लोग रक्तदान करते थे, तो कई लोग दवाइयों और अन्य जरूरतों की व्यवस्था में मदद करते थे। खास बात यह रही कि मदद करने वाले और मदद पाने वाले अक्सर एक-दूसरे को जानते भी नहीं थे।
अभियान से जुड़ी कई घटनाएं आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं। सुल्तानपुर के आठ माह के बालक अनमय के इलाज का मामला उनमें सबसे प्रमुख रहा। गंभीर बीमारी से जूझ रहे अनमय को एक बेहद महंगे विदेशी इंजेक्शन की जरूरत थी। परिवार के लिए इसकी व्यवस्था करना संभव नहीं था। जब यह जानकारी अभियान से जुड़े लोगों तक पहुंची तो सोशल मीडिया पर व्यापक सहयोग अभियान शुरू किया गया। छोटे-छोटे योगदानों ने मिलकर बड़ी राशि का रूप लिया और इलाज के लिए जरूरी धन जुटाया गया। उस समय लोगों के बीच एक ही भावना थी कि किसी तरह बच्चे की जान बचाई जाए।
इसी तरह प्रयागराज की एक बालिका के उपचार के लिए भी समाज ने आगे बढ़कर मदद की। उसकी मां सुनीता ने बेटी को जीवनदान देने के लिए किडनी दान करने का फैसला किया। इलाज और प्रत्यारोपण का खर्च परिवार की क्षमता से बाहर था। अभियान से जुड़े लोगों ने सहयोग जुटाया और लाखों रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। इससे परिवार को कठिन समय में बड़ी राहत मिली।
देवदूत वानर सेना केवल चिकित्सा सहायता तक सीमित नहीं रही। जरूरत पड़ने पर रक्त और प्लाज्मा की व्यवस्था की गई। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों के विवाह में मदद की गई। कई छात्रों की फीस जमा कराने में सहयोग दिया गया। जहां भी जरूरत दिखाई दी, वहां सहायता पहुंचाने का प्रयास किया गया।
इस अभियान की एक और खासियत इसकी व्यापक भागीदारी थी। इसमें छात्र, शिक्षक, व्यापारी, कर्मचारी, अधिकारी, चिकित्सक, अधिवक्ता, गृहिणियां और विदेशों में रहने वाले भारतीय भी जुड़े। अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एक साझा उद्देश्य के लिए साथ आए और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
हालांकि अभियान के सामने चुनौतियां भी आईं। कई बार संसाधनों की कमी रही, कई बार अपेक्षित सहयोग नहीं मिला और आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। इसके बावजूद लोगों की सेवा भावना ने अभियान को लगातार आगे बढ़ाया।
कोविड काल ने यह साबित किया कि तकनीक केवल सूचना और मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि मानवता को जोड़ने का प्रभावी साधन भी बन सकती है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और डिजिटल भुगतान व्यवस्था ने जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज जब कोविड काल को पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो आंकड़ों से ज्यादा वे लोग याद आते हैं जिन्होंने बिना किसी पहचान, पुरस्कार या प्रसिद्धि की इच्छा के दूसरों की मदद की। देवदूत वानर सेना की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि उसने कठिन समय में लोगों का मानवता पर विश्वास बनाए रखा।
आने वाले समय में भी यह पहल समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। इस अभियान ने दिखाया कि जब लोग एक-दूसरे के लिए खड़े होते हैं, तब असंभव लगने वाली चुनौतियों का भी सामना किया जा सकता है।

(लेखक दिव्यांग कल्याण विभाग में उपनिदेशक है)

 

 

 

 

VINAY PRAKASH SINGH
Author: VINAY PRAKASH SINGH

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