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मंदिरों की स्वायत्तता: सांस्कृतिक और सामाजिक सशक्तिकरण का आधार

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सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह का लेख 

मंदिरों की स्वायत्तता: सांस्कृतिक और सामाजिक सशक्तिकरण का आधार

आज के समय में यह प्रश्न तेजी से उभर रहा है कि क्या धार्मिक संस्थानों को पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह का यह विचार कि “हिंदू का धन हिंदू पर ही खर्च हो” एक व्यापक बहस को जन्म देता है। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि सामाजिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण का एक दृष्टिकोण है।

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह का लेख 
सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता रीना एन सिंह

भारतीय सभ्यता में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं रहे हैं, बल्कि वे समाज के संचालन का केंद्र भी रहे हैं। प्राचीन काल में मंदिरों के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और आर्थिक व्यवस्था संचालित होती थी। गुरुकुल और वेदशालाएं ज्ञान का प्रसार करती थीं, वहीं आरोग्यशालाएं समाज को चिकित्सा सुविधा प्रदान करती थीं। मंदिरों से जुड़े अन्नक्षेत्र और गौशालाएं सामाजिक सहयोग और सेवा का उदाहरण प्रस्तुत करते थे।
वर्तमान समय में कई मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं, जिससे उनकी पारंपरिक व्यवस्था और स्वायत्तता प्रभावित होती है। इस संदर्भ में यह तर्क दिया जाता है कि धार्मिक संस्थानों को अपने प्रबंधन और संचालन का अधिकार मिलना चाहिए, जैसा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 में उल्लेखित है। इन प्रावधानों के तहत प्रत्येक धार्मिक समुदाय को अपने धार्मिक मामलों को स्वतंत्र रूप से संचालित करने का अधिकार प्राप्त है।
मंदिरों की स्वायत्तता के पक्ष में एक महत्वपूर्ण तर्क यह भी है कि इससे संसाधनों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से समाज के कल्याण में किया जा सकता है। यदि मंदिरों की आय का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, निर्धन सहायता, महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण में किया जाए, तो यह समाज के समग्र विकास में सहायक हो सकता है।
हालांकि, इस विषय पर एक दूसरा पक्ष भी मौजूद है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी नियंत्रण पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है। इसलिए यदि स्वायत्तता दी जाए, तो उसके साथ पारदर्शी व्यवस्था, डिजिटल ऑडिट और सामाजिक भागीदारी भी अनिवार्य होनी चाहिए।
अंततः, मंदिरों की भूमिका को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था के रूप में समझने की आवश्यकता है। यदि संतुलित नीति के साथ उनकी स्वायत्तता और पारदर्शिता दोनों सुनिश्चित की जाएं, तो यह न केवल सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करेगा, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

लेखिका: रीना एन सिंह (सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता)

 

VINAY PRAKASH SINGH
Author: VINAY PRAKASH SINGH

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