लखनऊ,12जुलाई(चौथा प्रहरी)। उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग में आय से अधिक संपत्ति के मामलों को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। रिटायर्ड एआरटीओ ललित कुमार से जुड़े मामले के बाद अब विभाग के अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ पहले दर्ज शिकायतों की दोबारा जांच कराने की मांग उठ रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि पुराने मामलों की स्वतंत्र जांच होने पर कई तथ्य सामने आ सकते हैं। यदि पुरानी आय से अधिक संपत्ति के मामले की फाइल वर्तमान परिवहन आयुक्त खोल दे तो बड़ो-बड़ो की कलई खुल जाएगी।

बतादें कि लखनऊ में तैनात एक संभागीय निरीक्षक के खिलाफ मुख्यमंत्री पोर्टल आईजीआरएस पर शिकायत दर्ज कर विजिलेंस जांच की मांग की गई थी। उस समय विभागीय स्तर पर जांच की जरूरत नहीं मानते हुए तत्कालीन परिवहन आयुक्त ने शासन से शिकायत बंद करने की संस्तुति कर दी गई थी। अब उसी फैसले को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
उस समय लखनऊ के एआरटीओ प्रशासन प्रदीप कुमार सिंह व तत्कालीन आरटीओ संजय कुमार तिवारी की आख्या के आधार पर तत्कालीन परिवहन आयुक्त बीएन सिंह ने शासन को अपनी आख्या भेजी थी। लेकिन हाल के घटनाक्रम के बाद विभाग के भीतर यह चर्चा है कि यदि पुराने मामलों की दोबारा समीक्षा की जाए तो कई शिकायतों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
परिवहन विभाग से जुड़े जानकारों का मानना है कि लंबे समय से लंबित शिकायतों, अधिकारियों की घोषित संपत्तियों, संवेदनशील पदों पर तैनाती, विभागीय फैसलों और अन्य प्रशासनिक पहलुओं की निष्पक्ष जांच होने से कई मामलों की सच्चाई सामने आ सकती है। कुछ लोगों ने ड्राइविंग लाइसेंस व्यवस्था, निजी एजेंसियों की भूमिका और सड़क सुरक्षा से जुड़े संसाधनों के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए हैं।
हालांकि, इन सभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित अधिकारियों की ओर से भी अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में इन दावों की पुष्टि केवल सक्षम और निष्पक्ष जांच के बाद ही हो सकेगी।
यदि सरकार पुराने मामलों की फाइलों की समीक्षा कर विजिलेंस जांच का फैसला करती है, तो विभाग में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ सकती है। इससे यह भी साफ हो सकेगा कि किन शिकायतों में तथ्य थे और किन मामलों को पर्याप्त आधार न होने के कारण बंद किया गया था। अब सभी की नजर शासन के अगले कदम पर है।
Author: VINAY PRAKASH SINGH
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