प्रयागराज, 26 मार्च (सौरभ सोमवंशी)। नाबालिग बटुकों के साथ कथित यौन शोषण के आरोपों में घिरे विवादित शंकराचार्य अवमुक्तेश्वरानंद को इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत अब एक नए विवाद में घिरती नजर आ रही है। जमानत आदेश के बाद मामले में ऐसा मोड़ आया है, जिसने न्यायिक हलकों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा तेज कर दी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की बेंच ने 25 मार्च को अवमुक्तेश्वरानंद और उनके सहयोगियों को अग्रिम जमानत दे दी। लेकिन इस फैसले के बाद जो तथ्य सामने आए हैं, उन्होंने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

🔍 क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, इस केस में अग्रिम जमानत याचिका पर 27 फरवरी को सुनवाई हुई थी। उस दिन याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दिलीप कुमार गुप्ता के साथ उनके सहयोगी अधिवक्ता मौजूद थे। वहीं राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल और अन्य वकील कोर्ट में उपस्थित रहे।
27 फरवरी को सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। उस समय के अंतरिम आदेश में अवमुक्तेश्वरानंद की ओर से केवल तीन अधिवक्ताओं के नाम दर्ज थे।
⚖️ विवाद की असली वजह
मामले में विवाद तब शुरू हुआ जब 25 मार्च को अंतिम आदेश जारी हुआ। इस आदेश में अधिवक्ताओं की सूची में एक नया नाम जुड़ा—एडवोकेट वरदनाथ।
बताया जा रहा है कि वरदनाथ, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश विक्रम नाथ के पुत्र हैं। यही तथ्य अब पूरे मामले का सबसे बड़ा विवाद बन गया है।
❗ उठ रहे बड़े सवाल
कानूनी जानकारों और विपक्षी हलकों में अब कई सवाल उठ रहे हैं—
जब 27 फरवरी को सुनवाई पूरी हो चुकी थी और फैसला सुरक्षित रख लिया गया था, तो उसके बाद नए वकील की एंट्री क्यों हुई?
क्या वरदनाथ ने किसी प्रकार की अतिरिक्त बहस या दस्तावेज प्रस्तुत किए?
अगर नहीं, तो अंतिम आदेश में उनका नाम किस आधार पर जोड़ा गया?
इन सवालों के चलते मामला अब न्यायिक पारदर्शिता और प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़ गया है।
🏛️ घटनाक्रम ने बढ़ाई चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम को और भी दिलचस्प बनाता है 1 मार्च का एक कार्यक्रम, जब सुप्रीम कोर्ट के जज विक्रम नाथ इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आयोजन में शामिल होने प्रयागराज आए थे। इसके बाद 25 मार्च को जब आदेश जारी हुआ, तो अधिवक्ताओं की सूची में उनके पुत्र का नाम जुड़ा हुआ पाया गया।
हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
🧭 राजनीतिक एंगल भी चर्चा में
मामले को लेकर राजनीतिक रंग भी दिया जा रहा है। कुछ लोग इसे महज संयोग मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे प्रभाव और संरक्षण से जोड़कर देख रहे हैं।
यह भी चर्चा में है कि अवमुक्तेश्वरानंद द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ दिए गए बयानों के बाद यह पूरा घटनाक्रम सामने आया है, जिससे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
⚠️ निष्कर्ष
अवमुक्तेश्वरानंद को मिली जमानत अब सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं रह गई है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया, पारदर्शिता और संभावित प्रभाव के सवालों के केंद्र में आ गई है।
जब तक इस पूरे मामले पर आधिकारिक सफाई नहीं आती, तब तक यह विवाद थमने वाला नहीं दिख रहा।
Author: Chautha Prahari
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