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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को लीगल नोटिस: ब्राह्मण-क्षत्रिय विवाद भड़काने के आरोप, जातीय सौहार्द पर छिड़ी बहस

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नई दिल्ली,सौरभ सोमवंशी(वि.सं)17 अप्रैल।देश में एक बार फिर मीडिया की भूमिका और उसकी जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। चर्चित पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को ब्राह्मण-क्षत्रिय समाज के बीच कथित रूप से वैमनस्य फैलाने के आरोप में लीगल नोटिस भेजा गया है। यह नोटिस ब्राह्मण क्षत्रिय एकता मंच की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह के माध्यम से जारी किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट रीना एन सिंह द्वारा दी गई पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को लीगल नोटिस
नोटिस भेजने वालों में मंच के राष्ट्रीय संयोजक राजकुमार शुक्ला, सामाजिक कार्यकर्ता गणेश बल्लभ द्विवेदी और अधिवक्ता सौरभ सोमवंशी शामिल हैं। आरोप है कि अभिषेक उपाध्याय ने अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से पिछले एक महीने में कई ऐसे वीडियो और थंबनेल प्रकाशित किए, जिनमें जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए समाज में विभाजन और असंतोष पैदा करने की कोशिश की गई।
क्या हैं मुख्य आरोप?
लीगल नोटिस में कहा गया है कि पत्रकार द्वारा प्रकाशित कंटेंट में “पंडित को भी नहीं बख्शा”, “यूपी में ठाकुर राज पर मोहर” और “ब्राह्मण होने की सजा” जैसे शीर्षकों का प्रयोग किया गया, जो दो प्रमुख जातियों के बीच शत्रुता और तनाव बढ़ाने वाला है। आरोप है कि यह न केवल सामाजिक समरसता को प्रभावित करता है बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकता है।
नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया है कि इस तरह की सामग्री भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करती है। साथ ही, अनुच्छेद 19(1) के तहत मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को भी पार किया गया है, जो अनुच्छेद 19(2) के तहत प्रतिबंधित है।
विवादित वीडियो का जिक्र
मामले में एक अन्य विवादित वीडियो का भी हवाला दिया गया है, जिसमें धार्मिक नेता अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बयान को दिखाया गया था। इस वीडियो में अभिनेता और सांसद रवि किशन को लेकर विवादित टिप्पणी की गई थी, जिसे लेकर भी आपत्ति जताई गई है।
कानूनी आधार क्या?
नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री प्रसारित करे। इसमें भारतीय प्रेस परिषद अधिनियम 1978 और भारतीय न्याय संहिता 2023 के विभिन्न प्रावधानों का हवाला दिया गया है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप साबित होते हैं, तो यह मामला न केवल मानहानि बल्कि सामाजिक अशांति फैलाने की श्रेणी में भी आ सकता है।
सामाजिक और राजनीतिक असर
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब देश में सामाजिक समरसता और जातीय एकता को लेकर संवेदनशील माहौल बना हुआ है। ब्राह्मण क्षत्रिय एकता मंच का कहना है कि उनका उद्देश्य समाज में भाईचारा बनाए रखना है और किसी भी तरह की विभाजनकारी राजनीति या पत्रकारिता का विरोध करना है।
विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के दौर में कंटेंट क्रिएटर्स और पत्रकारों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। एक गलत नैरेटिव न केवल सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा सकता है, बल्कि कानून-व्यवस्था पर भी असर डाल सकता है।
आगे क्या?
फिलहाल अभिषेक उपाध्याय की ओर से इस नोटिस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, यह मामला आने वाले दिनों में कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर बड़ा रूप ले सकता है।

Chautha Prahari
Author: Chautha Prahari

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