लखनऊ,05जून(चौथा प्रहरी)। राजधानी लखनऊ में उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की नियुक्ति और उनके लंबे समय तक पद पर बने रहने को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई शुरू होने से पहले ही नया मोड़ आ गया। लखनऊ खंडपीठ की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला ने कहा कि वे प्रदीप दुबे को पहले से जानते हैं, इसलिए निष्पक्षता बनाए रखने के लिए इस मामले की सुनवाई नहीं करेंगे।

यह मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा में सूचना अधिकारी रह चुके कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में पेश हुई थीं। इसी दौरान पीठ ने स्वयं को मामले से अलग करने का निर्णय लिया।
क्या है पूरा विवाद?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदीप दुबे की प्रारंभिक नियुक्ति से लेकर वर्तमान तक का पूरा कार्यकाल नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। याचिकाकर्ता का दावा है कि उनकी नियुक्ति वर्ष 2009 में विधानसभा सचिवालय (भर्ती एवं सेवा शर्तें) नियमावली, 1974 की अनदेखी करते हुए की गई थी।
याचिका के अनुसार चयन श्रेणी के पदों के लिए अधिकतम आयु 52 वर्ष निर्धारित थी, जबकि नियुक्ति के समय उनकी आयु इससे अधिक थी। आरोप है कि 13 जनवरी 2009 को न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त कर दिया गया और कुछ दिनों बाद विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव का प्रभार भी सौंप दिया गया।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस प्रक्रिया में न तो कोई विज्ञापन जारी हुआ, न प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया अपनाई गई और न ही उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग से आवश्यक परामर्श लिया गया।
सेवा विस्तार पर भी सवाल
याचिका में वर्ष 2010-11 में विधानसभा सचिवालय सेवा नियमों में किए गए संशोधनों पर भी सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि इन्हीं संशोधनों के आधार पर प्रदीप दुबे को लगातार सेवा विस्तार मिलता रहा।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि प्रदीप दुबे 30 अप्रैल 2019 को सेवानिवृत्ति की आयु पूरी कर चुके थे। इसके बाद सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष किए जाने का लाभ भी उन्हें नहीं मिलना चाहिए था। इसके बावजूद वे आज भी प्रमुख सचिव पद पर कार्यरत हैं। याचिका में उनकी वर्तमान आयु 68 वर्ष से अधिक बताई गई है।
अधिवक्ता रीना एन सिंह ने क्या कहा?
अधिवक्ता रीना एन सिंह का कहना है कि याचिका में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाया गया है। उनका दावा है कि यदि किसी व्यक्ति के पास किसी सार्वजनिक पद पर बने रहने का वैध कानूनी अधिकार नहीं है, तो उससे यह पूछा जाना चाहिए कि वह किस अधिकार से उस पद पर कार्य कर रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदीप दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार और पद पर बने रहने से जुड़े दस्तावेज और आदेश सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हैं। इसी कारण अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई है।
क्वो वारंटो रिट की मांग
याचिका में अदालत से क्वो वारंटो (Quo Warranto) रिट जारी करने की मांग की गई है। इसके तहत किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति से पूछा जाता है कि वह किस कानूनी अधिकार के आधार पर उस पद पर बना हुआ है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि प्रदीप दुबे की नियुक्ति और पद पर बने रहने की वैधता की जांच की जाए, यदि नियुक्ति अवैध पाई जाए तो उन्हें पद से हटाया जाए और प्रमुख सचिव का पद नियमों के अनुसार चयन प्रक्रिया के माध्यम से भरा जाए।
आगे क्या होगा?
फिलहाल डिवीजन बेंच द्वारा खुद को मामले से अलग करने के बाद यह याचिका किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध की जा सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि नई पीठ इस मामले की सुनवाई कब करती है और याचिका में लगाए गए आरोपों पर क्या रुख अपनाती है।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि याचिका में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं और अदालत की ओर से इन पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया गया है। इसलिए आरोपों को फिलहाल केवल याचिकाकर्ता के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
Author: VINAY PRAKASH SINGH
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