(विनय प्रकाश सिंह)
लखनऊ,24मई(चौथा प्रहरी)। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर बड़ी चर्चा शुरू हो गई है। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने में अब सिर्फ 48 घंटे बचे हैं, लेकिन अभी तक नए चुनाव की तस्वीर साफ नहीं है। ऐसे में सत्ता के गलियारों में यह चर्चा तेज है कि सरकार पूर्व ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाकर ग्राम पंचायतों के कामकाज और खजाने की जिम्मेदारी सौंप सकती है।
बताया जा रहा है कि प्रदेश सरकार विधानसभा चुनाव से पहले कोई ऐसा फैसला नहीं लेना चाहती जिससे ग्रामीण इलाकों में नाराजगी बढ़े। ग्राम प्रधानों ने भी सरकार की इस राजनीतिक मजबूरी को समझते हुए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। इसी वजह से पूर्व प्रधानों को प्रशासनिक जिम्मेदारी देने का रास्ता तलाशा जा रहा है।

प्रदेश में पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाने की सबसे बड़ी वजह परिसीमन और कानूनी प्रक्रिया को माना जा रहा है। सरकार 2026 से पहले चुनाव कराने की स्थिति में नहीं दिख रही है। वहीं, नवंबर 2026 से पहले चुनाव कराना भी मुश्किल बताया जा रहा है। नौकरशाही के स्तर पर ऐसे संकेत मिलने लगे हैं कि सरकार अदालती प्रक्रिया और अन्य तकनीकी कारणों का हवाला देकर पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद कराने की तैयारी में है।
अगर ऐसा होता है तो हजारों पूर्व ग्राम प्रधानों को बड़ा फायदा मिलेगा। पंचायतों के विकास कार्य, सरकारी योजनाओं का संचालन और पंचायत निधि के खर्च का अधिकार फिर उन्हीं के हाथ में आ सकता है। इससे गांव की राजनीति भी गर्माने लगी है।
विपक्षी दल इस मुद्दे को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़कर सरकार पर सवाल उठा सकते हैं। उनका कहना हो सकता है कि समय पर चुनाव न होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। वहीं सरकार इसे प्रशासनिक और कानूनी मजबूरी बताकर बचाव कर सकती है।
आने वाले महीनों में पंचायत चुनाव का मुद्दा प्रदेश की राजनीति में और बड़ा हो सकता है। खासकर ग्रामीण वोट बैंक को देखते हुए सरकार हर कदम बेहद सावधानी से उठाना चाहती है। अगर पूर्व प्रधानों को प्रशासक बनाया जाता है तो गांव की सत्ता में उनकी पकड़ लंबे समय तक बनी रह सकती है।
Author: VINAY PRAKASH SINGH
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