आरक्षण पर मुख्य न्यायाधीश के विचारों पर मंथन करें विधायिका-रीना एन सिंहं
नई दिल्ली, चौथा प्रहरी 22 नवंबर (रीना एन सिंह)-सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई जी ने अनुसूचित जाति को दिये जाने वाले आरक्षण में क्रीमी लेयर के सिद्धांत को लागू करने की आवश्यकता को लेकर जो विचार व्यक्त किए,
यह समय की आवश्यकता है। और समाज के हित में भी है
निश्चित रूप से एक अधिकारी और एक गरीब मजदूर के बेटे की तुलना नहीं हो सकती है निश्चित रूप से आर्थिक रूप से जब कोई व्यक्ति संपन्न हो जाता है, तो उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होती है इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने अनुसूचित जाति को दिए जाने वाले आरक्षण में क्रीमीलेयर की बात की है। ठीक इसी विषय पर हमने पिछड़ा वर्ग और दलित वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर अभ्यर्थियों की ओर से माननीय सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की है जिसे न्यायाधीश माननीय सूर्यकांत महोदय और जायमाल्या बागची जी की पीठ ने 11 अगस्त 2025 को स्वीकार किया, जिसमें हमने पिछड़ा वर्ग के आरक्षण से क्रीमीलेयर को बाहर किए जाने की मांग की है।एक सीधा और सरल सिद्धांत है कि मदद वहां होनी चाहिए जहां उसकी सर्वाधिक आवश्यकता है जिसका पेट पहले से ही भरा है उसे भोजन की आवश्यकता नहीं होती है। मुख्य न्यायाधीश का कहना था कि क्रीमी लेयर का जो सिद्धांत अन्य पिछड़ा वर्ग अर्थात ओबीसी आरक्षण में लागू है, वही अन्य आरक्षित वर्गों यानी अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण में भी लागू किया जाए।कुछ लोग उनकी आलोचना करेंगे कुछ लोग उनका समर्थन करेंगे ठीक इसी तरह से हमारी जनहित याचिका को स्वीकार करते समय माननीय न्यायालय ने हमारा उत्साहवर्धन करने के साथ-साथ हमें अपनी मांग के व्यापक विरोध के लिए तैयार रहने के लिए भी कहा था। और हमें भी सोशल मीडिया पर समर्थन और आलोचना का शिकार होना पड़ा था। लेकिन न्याय और नीति कि जब बात की जाती है तो यह कहा जा सकता है कि आरक्षण की व्यवस्था को इस तरह लागू किया जाए कि पात्र लोगों को ही उसका लाभ मिलना सुनिश्चित हो सके। यही पिछड़ा वर्ग और दलित वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की भी मांग है। सच्चा सामाजिक न्याय तभी स्थापित होगा जब जन्म नहीं बल्कि अवसर तय करेगा कि कौन कितना आगे बढ़ सकता है और आरक्षण की सफलता भी तभी मानी जाएगी जब इसका लाभ वास्तव में जरूरतमंद और सबसे वंचित लोगों तक पहुंचे ।
वर्तमान में स्थापित व्यवस्था के कारण कई संपन्न और स्थापित परिवार लगातार आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं जबकि अत्यंत गरीब और पिछड़े परिवार के लोग पीछे छूट जा रहे हैं मुख्य न्यायाधीश महोदय की चिंता इसी बात को लेकर के है वह चाहते हैं कि आरक्षण कुछ परिवारों का स्थाई विशेषाधिकार ना बनकर एक प्रगतिशील व्यवस्था बने जो वास्तविक गरीबों को आगे बढ़ने का अवसर दे। एक तथ्य यह भी है कि जब आरक्षित वर्ग के संपन्न लोगों के द्वारा स्वयं ही आरक्षण छोड़ दिया जाएगा या फिर उनको आरक्षण का लाभ मिलना बंद हो जाएगा तो आरक्षण इस वर्ग के और निचले तबके तक पहुंच पाएगा।
निश्चित रूप से तब जाकर आरक्षण को लागू करने का उद्देश्य सार्थक हो पाएगा और देश सामाजिक रूप से सशक्त हो पाएगा और एक न्यायपूर्ण और समता मूलक सशक्त भविष्य की ओर हम सभी बढ़ सकेंगे।
(लेखिका सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता हैं
और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण को लेकर एक जनहित याचिका दाखिल कर रखी है)
Author: Chautha Prahari
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