रीना एन सिंह
एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट
गोरखनाथ पीठ, ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और वीर सावरकर का संबंध भारतीय राष्ट्रवादी इतिहास की वह प्रचण्ड धारा है जिसे वामपंथी इतिहासकारों और मुख्यधारा मीडिया ने सबसे ज्यादा छुपाया। कारण स्पष्ट है, यदि यह सत्य सामने आ जाए कि सम्पूर्ण भारत में हिंदू चेतना को संगठित करने वाला असली केंद्र कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि हजार वर्षों से तप में डूबा हुआ गोरखनाथ मठ था, तो उनके पूरे विचार-तंत्र की नींव हिल जाती है। उदयपुर के सिसोदिया राजवंश से आने वाले महंत दिग्विजयनाथ जी केवल एक संन्यासी नहीं थे, वे एक ऐसे महायोगी थे जिनकी रणनीति, संगठन क्षमता, अप्रतिम जनस्वीकार्यता, आध्यात्मिक आभा तथा गोरखनाथ मठ की अद्भुत आर्थिक क्षमता ने सम्पूर्ण भारत के हिंदू समाज को एक धुरी पर संगठित कर दिया। आज़ादी से पूर्व जब 1930 के दशक में वे हिंदू महासभा से जुड़े, तब देश की आज़ादी के विचारों को जिस सबसे बड़ी शक्ति ने सम्पूर्ण भारत में जमीन दी, वह थी, दिग्विजयनाथ जी का नेतृत्र्व और गोरखनाथ मठ का अपार सामर्थ्य। गोरखनाथ मठ केवल एक तीर्थ नहीं था, वह नेपाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, अवध, बुंदेलखंड, तराई, झारखंड, यहां तक कि दक्षिण भारत तक फैले हिंदू संगठनों का केंद्र था। ब्रिटिश खुफिया रिपोर्ट, हिन्दू महासभा के रिकॉर्ड और गोरखनाथ पीठ के दस्तावेज़ इस सत्य पर मुहर लगाते हैं। अनेकों स्वतंत्रता आंदोलनों में हिंदू संगठनों, यात्राओं, सभाओं, रक्ष समितियों, गौ–रक्षा अभियानों और राम जन्मभूमि संघर्ष सहित लगभग हर बड़े प्रयास के आर्थिक, सामरिक आधार में गोरखनाथ मठ प्रमुख भूमिका में था। इसीलिए इतिहासकार मानते हैं: “जो सनातन ने दिया, उसे जन–जन तक पहुंचाने का जीवंत विस्तार दिग्विजयनाथ जी ने किया।”
आज़ादी से पूर्व जहाँ अनेक राष्ट्रवादी सेनानी आर्थिक संघर्षों से जूझ रहे थे, वहीं गोरखनाथ मठ की संपन्नता, दान, व्यापारिक सहयोग, राजघरानों का समर्थन और लाखों भक्तों की आस्था स्वतंत्रता आंदोलनों की वास्तविक रीढ़ थी। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद जब पूरे देश में हिंदू समाज को रक्षात्मक कर दिया गया, तब भी उत्तर भारत में केवल एक आवाज दृढ़ता और निर्भीकता से हिंदू समाज के पक्ष में खड़ी रही वह आवाज़ थी ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी की और फिर आया वह निर्णायक क्षण जिसने इतिहास बदल दिया, 22 दिसंबर 1949 अयोध्या में श्री रामलला का प्राकट्य। यह घटना केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि दिग्विजयनाथ जी की दशकों की तपस्या, संघर्ष और रणनीतिक दूरदृष्टि का चरम परिणाम थी। इस घटना के तुरंत बाद वीर सावरकर ने दिग्विजयनाथ जी को निजी संदेश भेजकर बधाई दी जो यह सिद्ध करता है कि दोनों के बीच केवल राजनीतिक संबंध नहीं, बल्कि गहरी वैचारिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक एकता थी। दिग्विजयनाथ जी के बाद इस ज्योति को महंत अवेद्यनाथ जी ने प्रज्वलित ज्वाला में बदला। अवेद्यनाथ जी ने 1980–1990 में वह विशाल जनांदोलन खड़ा किया जिसने राम जन्मभूमि संघर्ष को राष्ट्रीय विमर्श बना दिया और इसी परंपरा की तीसरी महान कड़ी योगी आदित्यनाथ आज भारत के सबसे प्रभावशाली, सबसे विश्वसनीय और सबसे तेजस्वी नेता के रूप में खड़े हैं। योगी केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि गोरखनाथ परंपरा की अग्निशिखा हैं। उनका तप, निर्भीकता, प्रशासनिक तेज, राष्ट्रवादी दृष्टि और सनातन के प्रति अगाध निष्ठा ने करोड़ों भारतीयों में यह विश्वास जगाया है कि “योगी आदित्यनाथ दिग्विजयनाथ परंपरा के सच्चे उत्तराधिकारी हैं और इसी कारण वे भारत के भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में सबसे स्वाभाविक विकल्प हैं।” मीडिया गोरखनाथ की महानता को इसलिए छुपाता है क्योंकि इससे वह भ्रम समाप्त हो जाता है कि राम मंदिर किसी पार्टी या नेता की देन था। वास्तविकता यह है कि गोरखनाथ मठ का 80–90 वर्षों का सतत संघर्ष, आर्थिक सामर्थ्य, कूटनीतिक कौशल और तपस्वी नेतृत्व इन्हीं सबने अयोध्या में रामलला का पुनर्प्राकट्य संभव किया। यह वह इतिहास है जिसे दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। जिससे डरकर वामपंथी चुप हैं, पर राष्ट्रवादी गर्व से बोल रहे हैं, क्योंकि सत्य सदैव विजयी होता है, गोरखनाथ परंपरा सत्य, शक्ति और सनातन की जीवंत ज्योति है। यह इतिहास अब किसी की इच्छा से बदला नहीं जा सकता, गोरखनाथ पीठ वह शक्ति है जिसने सम्पूर्ण भारत में राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित किया। महंत दिग्विजयनाथ जी वह महामहिम थे जिन्होंने हिंदू राजनीति की आधारशिला रखी और योगी आदित्यनाथ वह उदित होता सूर्य हैं जिन्हें आज पूरा भारत सनातन युग के नेता और आने वाले प्रधानमंत्री के रूप में देख रहा है। हिन्दू समाज सदा गोरखनाथ मठ का ऋणी रहेगा।
Author: Chautha Prahari
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