लखनऊ, 01अगस्त(चौथा प्रहरी)। उत्तर प्रदेश में गो संरक्षण अब केवल पशुओं की देखभाल तक सीमित नहीं रह गया है। बीते कुछ वर्षों में यह ग्रामीण रोजगार, छोटे उद्योग और स्वरोजगार का नया माध्यम बनकर उभरा है। सरकार की नीतियों के साथ निजी संस्थाओं और उद्यमियों की भागीदारी बढ़ने से देसी गायों पर आधारित उत्पादों का कारोबार लगातार फैल रहा है। इन उत्पादों की मांग अब देश के साथ विदेशों में भी बढ़ रही है।

राज्य में देसी गायों के दूध, घी, पंचगव्य उत्पाद, जैविक खाद, हर्बल सामग्री और प्राकृतिक उत्पादों का उत्पादन पहले की तुलना में अधिक संगठित तरीके से हो रहा है। इससे गांवों में रोजगार के नए अवसर बने हैं और कई लोगों ने इसे अपने व्यवसाय का आधार बनाया है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रहा सहारा
विशेषज्ञों का मानना है कि देसी नस्ल की गायों पर आधारित उत्पादों की बढ़ती मांग ने ग्रामीण क्षेत्रों में नई आर्थिक गतिविधियां शुरू की हैं। कई गोशालाएं अब केवल पशुओं के आश्रय स्थल नहीं हैं, बल्कि उत्पादन और प्रशिक्षण केंद्र के रूप में भी काम कर रही हैं।
A2 दूध, बिलौना घी, जैविक खाद और पंचगव्य उत्पादों की बढ़ती मांग ने इस क्षेत्र में निवेश को भी बढ़ावा दिया है। कई संस्थाएं ऑनलाइन माध्यम से अपने उत्पाद देश के अलग-अलग राज्यों और विदेशों तक भेज रही हैं।
बताया जा रहा है कि अमेरिका, जापान, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, दुबई और यूरोप के कई देशों में भी उत्तर प्रदेश से जुड़े देसी गायों के उत्पाद पहुंच रहे हैं।
सॉफ्टवेयर इंजीनियर से बने गो आधारित उद्यमी
गाजियाबाद के असीम रावत इसका प्रमुख उदाहरण हैं। लंबे समय तक सॉफ्टवेयर क्षेत्र में काम करने के बाद उन्होंने गो संरक्षण से जुड़ा उद्यम शुरू किया। उनकी संस्था आज देसी गायों के संरक्षण के साथ A2 घी, दूध, आयुर्वेदिक उत्पाद, हर्बल सामग्री, खाद्य उत्पाद और स्किन केयर सहित 150 से अधिक उत्पाद तैयार कर रही है। संस्था वृद्ध गोवंश की देखभाल भी करती है और स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध करा रही है।
वाराणसी का मॉडल भी बना मिसाल
वाराणसी का सुरभि शोध संस्थान भी बड़े स्तर पर गो संरक्षण और उत्पादन का काम कर रहा है। संस्था की विभिन्न स्थानों पर संचालित गोशालाओं में हजारों गोवंश हैं। गोबर और गोमूत्र का उपयोग जैविक खेती और अन्य उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। इस मॉडल से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलने का दावा किया गया है।
बुलंदशहर में भी सफल प्रयोग
बुलंदशहर के पर्यावरण इंजीनियर पराग गौड़ ने भी सीमित संख्या में देसी गायों के साथ गो आधारित उद्यम विकसित किया है। यहां दूध, घी और अन्य पारंपरिक उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के साथ किसानों और पशुपालकों के लिए नई संभावनाएं बनी हैं।
देसी नस्ल पर बढ़ रहा जोर
राज्य में देसी नस्ल की गायों को बढ़ावा देने के प्रयास जारी हैं। इसके साथ गो संरक्षण को जैविक खेती, महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्योगों से जोड़ने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। इससे गांवों में आय के नए स्रोत विकसित होने की उम्मीद जताई जा रही है।
आगे क्या असर होगा
यदि गो आधारित उद्योगों का विस्तार इसी गति से जारी रहा तो उत्तर प्रदेश में ग्रामीण उद्यमिता को और मजबूती मिल सकती है। जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग किसानों, पशुपालकों और छोटे उद्यमियों के लिए नए बाजार खोल सकती है। हालांकि, इस क्षेत्र की दीर्घकालिक सफलता उत्पादों की गुणवत्ता, वैज्ञानिक मानकों, बाजार तक पहुंच और उपभोक्ता विश्वास बनाए रखने पर निर्भर करेगी।
Author: VINAY PRAKASH SINGH
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