(विनय प्रकाश सिंह)
यूपीआई यानि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस आज भारत में डिजिटल भुगतान का सबसे आसान और लोकप्रिय माध्यम बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक और रोजमर्रा की छोटी खरीदारी से लेकर बड़े कारोबारी भुगतान तक, यूपीआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। ऐसे में पिछले कुछ दिनों से सामाजिक माध्यमों पर यह चर्चा तेज है कि अब यूपीआई से भुगतान करने पर लोगों को भी शुल्क देना पड़ेगा।
लेकिन पूरी तस्वीर इससे अलग है।

नए कानूनी बदलाव ने भविष्य में कुछ डिजिटल भुगतानों पर व्यापारी छूट दर यानी एमडीआर लगाने का रास्ता जरूर खोला है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आज से हर यूपीआई भुगतान पर ग्राहक से शुल्क लिया जा रहा है। फिलहाल आम ग्राहक के लिए यूपीआई भुगतान पहले की तरह जारी है। प्रस्तावित शुल्क का भार ग्राहक के बजाय कुछ विशेष व्यापारिक लेनदेन पर डाला जा सकता है।
क्या यूपीआई पर अभी कोई शुल्क लगेगा?
सबसे पहले सबसे जरूरी बात समझना आवश्यक है। इस समय सामान्य यूपीआई भुगतान करने वाले ग्राहक से कोई नया यूपीआई शुल्क नहीं लिया जा रहा है।
कानून में बदलाव का उद्देश्य तत्काल प्रत्येक यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाना नहीं है। इसके जरिए भविष्य में सरकार को कुछ डिजिटल भुगतान सेवाओं पर शुल्क की व्यवस्था करने की कानूनी गुंजाइश मिलती है।
इसलिए सामाजिक माध्यमों पर चल रहा यह दावा कि “अब हर यूपीआई भुगतान पर पैसा कटेगा”, पूरी तस्वीर नहीं बताता।
वर्तमान व्यवस्था में यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड के कई लेनदेन पर व्यापारी छूट दर शून्य रखी गई है। सरकार ने भारत में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और स्वदेशी भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने के लिए यह व्यवस्था लागू की थी।
यही वजह है कि आम उपभोक्ता के लिए यूपीआई भुगतान बेहद सुविधाजनक और कम लागत वाला बना रहा है।
व्यापारी छूट दर क्या है और इसका भुगतान कौन करता है?
व्यापारी छूट दर यानी एमडीआर वह शुल्क है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारी से भुगतान व्यवस्था में शामिल संस्थाओं को मिलता है। इसे ग्राहक के बैंक खाते से सीधे काटे जाने वाले सामान्य यूपीआई शुल्क के रूप में समझना सही नहीं होगा।
उदाहरण के लिए यदि किसी बड़े व्यापारी पर भविष्य में ०.५ प्रतिशत व्यापारी छूट दर लागू होती है और किसी सामान की कीमत ५,००० रुपये है, तो शुल्क २५ रुपये होगा। यह शुल्क व्यापारी के स्तर पर होगा। ग्राहक के यूपीआई खाते से अलग से २५ रुपये काटना जरूरी नहीं है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी है। अगर किसी व्यापारी की लागत बढ़ती है तो वह उसे अपनी वस्तुओं और सेवाओं की कीमत में शामिल कर सकता है। इसलिए भविष्य में व्यापारी छूट दर लागू होने की स्थिति में इसका अप्रत्यक्ष असर ग्राहकों तक पहुंचने की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
इसी कारण सरकार और भुगतान क्षेत्र के बीच यह बहस महत्वपूर्ण है कि शुल्क कितना हो, किन कारोबारियों पर लगे और किस तरह लागू किया जाए।
यूपीआई और रुपे को शुल्क से छूट क्यों दी गई थी?
यूपीआई और रुपे को बढ़ावा देने के लिए वर्ष २०२० से व्यापारी छूट दर को शून्य कर दिया गया था। इसका उद्देश्य भारत में डिजिटल भुगतान को तेजी से बढ़ाना और स्वदेशी भुगतान नेटवर्क को मजबूत करना था।
इस फैसले का असर भी दिखाई दिया। यूपीआई के माध्यम से होने वाले लेनदेन में पिछले कुछ वर्षों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। आज देश में रोजाना करोड़ों यूपीआई भुगतान होते हैं और इनका कुल मूल्य लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
यूपीआई अब केवल भुगतान का एक विकल्प नहीं रहा, बल्कि भारत के डिजिटल वित्तीय ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
इसीलिए यूपीआई के संचालन की लागत को लेकर भी चर्चा बढ़ी है। सर्वर, साइबर सुरक्षा, तकनीकी ढांचे, बैंकिंग नेटवर्क और लगातार बढ़ते लेनदेन को संभालने के लिए भुगतान व्यवस्था में लगातार निवेश करना पड़ता है।
फिर व्यापारी छूट दर लगाने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?
यूपीआई के विस्तार के साथ एक बड़ा आर्थिक सवाल सामने आया है—इतने बड़े डिजिटल भुगतान नेटवर्क की लागत कौन उठाए?
अभी यूपीआई पर ग्राहक से सीधे शुल्क नहीं लिया जाता और व्यापारी भुगतान पर भी व्यापारी छूट दर शून्य है। ऐसे में बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता और अन्य संस्थाएं इस व्यवस्था की परिचालन लागत वहन करती हैं।
सरकार डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन राशि भी देती है। लेकिन जैसे-जैसे यूपीआई का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसके तकनीकी ढांचे को बनाए रखने और मजबूत करने की लागत भी बढ़ रही है।
समर्थकों का तर्क है कि इतने बड़े डिजिटल भुगतान नेटवर्क के लिए स्थायी आर्थिक व्यवस्था जरूरी है। उनका कहना है कि यदि बड़े व्यापारिक लेनदेन पर मामूली शुल्क लगाया जाता है तो उससे भुगतान व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए आय प्राप्त हो सकती है।
दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत ही उसका सरल और कम लागत वाला होना है। यदि व्यापारियों पर शुल्क बढ़ता है तो इसका असर छोटे कारोबारियों और डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता पर पड़ सकता है।
किन लेनदेन पर शुल्क लगाने की चर्चा है?
अभी जिस व्यवस्था की चर्चा हो रही है, उसमें सामान्य छोटे भुगतान को सीधे निशाना बनाने की बात नहीं है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार २,००० रुपये से अधिक के कुछ व्यापारिक यूपीआई लेनदेन और बड़े कारोबारियों को शुल्क के दायरे में लाने का विकल्प विचाराधीन रहा है।
कुछ रिपोर्टों में ०.२५ से ०.५ प्रतिशत तक की संभावित दरों का उल्लेख किया गया है। छोटे कारोबारियों को इससे बाहर रखने की संभावना भी बताई गई है।
हालांकि यहां यह बात स्पष्ट समझना जरूरी है कि ये संभावित दरें हैं, अंतिम लागू दर नहीं।
यदि किसी बड़े व्यापारी पर ०.३ प्रतिशत शुल्क लागू होता है और वह ५,००० रुपये का भुगतान स्वीकार करता है तो शुल्क १५ रुपये होगा। ०.५ प्रतिशत की दर पर यही शुल्क २५ रुपये होगा।
लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को पैसे भेजने वाले भुगतान पर इस तरह का व्यापारी शुल्क लागू होने की बात नहीं है।
अमेरिका, वीजा और मास्टरकार्ड का मुद्दा क्यों उठा?
यूपीआई और रुपे की सफलता का असर अंतरराष्ट्रीय भुगतान नेटवर्क पर भी पड़ा है। भारत में डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के कारण घरेलू भुगतान प्रणालियों की भूमिका मजबूत हुई है।
इसी संदर्भ में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी सामने आए हैं। विपक्ष की ओर से आरोप लगाया गया है कि अमेरिकी भुगतान कंपनियों को समान अवसर देने के लिए यूपीआई और रुपे पर व्यापारी छूट दर की व्यवस्था वापस लाने की कोशिश की जा रही है।
सरकार ने इस आरोप को खारिज किया है और इसे राजनीतिक दुष्प्रचार बताया है।
इस विवाद को समझने के लिए यह देखना जरूरी होगा कि अंतिम नियम किस आधार पर बनाए जाते हैं। केवल कानून में व्यापारी छूट दर लगाने की संभावना पैदा होने से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि यह फैसला किसी विदेशी दबाव के कारण ही लिया गया है।
आम आदमी के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है?
इस पूरे मामले में आम यूपीआई उपयोगकर्ता के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि हर यूपीआई भुगतान पर तत्काल कोई नया शुल्क लागू नहीं हुआ है।
कानून में बदलाव से भविष्य में कुछ विशेष व्यापारिक लेनदेन पर व्यापारी छूट दर लागू करने की संभावना बनी है। इसके बाद सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं को यह तय करना होगा कि शुल्क किस भुगतान पर लगेगा, इसकी दर क्या होगी और किन व्यापारियों को इससे छूट मिलेगी।
इसलिए सामाजिक माध्यमों पर “यूपीआई बंद हो जाएगा”, “हर भुगतान पर शुल्क लगेगा” या “२,००० रुपये से ऊपर भुगतान करने पर ग्राहक के खाते से पैसा कटेगा” जैसे दावों को बिना आधिकारिक जानकारी के सच मानना उचित नहीं है।
आगे क्या होगा?
लोकसभा से संबंधित विधेयक पारित होने के बाद अभी इसकी आगे की संसदीय और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होना बाकी है। इसके बाद ही संबंधित प्रावधान प्रभावी होने और भविष्य में शुल्क व्यवस्था लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
मौजूदा स्थिति में कानून स्वयं कोई निश्चित व्यापारी शुल्क दर घोषित नहीं करता।
इसका मतलब साफ है—कानून ने शुल्क लगाने का रास्ता खोला है, लेकिन शुल्क की अंतिम दर और उसका दायरा अलग प्रक्रिया से तय होगा।
आने वाले समय में सबसे ज्यादा नजर इस बात पर रहेगी कि क्या सरकार केवल बड़े व्यापारिक लेनदेन तक व्यापारी छूट दर सीमित रखती है या इसके दायरे को आगे बढ़ाया जाता है।
चौथा प्रहरी का नजरिया
यूपीआई भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इसकी सफलता का सबसे बड़ा कारण इसकी सरलता, तेज गति और कम लागत वाली व्यवस्था रही है। इसलिए किसी भी शुल्क व्यवस्था का निर्धारण करते समय आम उपभोक्ता, छोटे दुकानदार और डिजिटल भुगतान के विस्तार—तीनों के हितों का संतुलन जरूरी होगा।
फिलहाल यह कहना सही नहीं है कि “यूपीआई अब मुफ्त नहीं रहेगा और हर भुगतान पर ग्राहक से पैसा लिया जाएगा।”
सही स्थिति यह है कि कानून में भविष्य में कुछ व्यापारिक यूपीआई लेनदेन पर व्यापारी छूट दर लगाने की संभावना पैदा हुई है। ग्राहक के लिए यूपीआई भुगतान पर तत्काल कोई नया शुल्क लागू नहीं हुआ है।
अब असली फैसला आगे आने वाले नियमों और अधिसूचनाओं से होगा। इसलिए अफवाहों के बजाय अंतिम सरकारी नियमों का इंतजार करना ही सबसे सुरक्षित और सही तरीका है।
Author: VINAY PRAKASH SINGH
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