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क्यों कमजोर पड़ रहे हैं रिश्ते? बदलती जीवनशैली के बीच बढ़ती दूरियां चिंता का विषय

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परिवार के सदस्य आपस में बातचीत करते हुए,रिश्तों और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीकात्मक दृश्य  

आज के दौर में लोगों की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। पढ़ाई, करियर, निजी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पहले से अधिक महत्व दिया जा रहा है। विकास और आत्मनिर्भरता अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ एक सवाल भी खड़ा हो रहा है कि आखिर रिश्तों की अहमियत क्यों कम होती जा रही है।

परिवार के सदस्य आपस में बातचीत करते हुए,रिश्तों और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीकात्मक दृश्य 
 
विशेषज्ञों और समाज के जानकारों का मानना है कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में लोग अपने परिवार और रिश्तों के लिए पहले जैसा समय नहीं निकाल पा रहे हैं। व्यस्तता बढ़ने के साथ-साथ आपसी संवाद भी कम हुआ है। इसका असर परिवारों के भीतर रिश्तों की गर्माहट और भरोसे पर दिखाई देने लगा है।
रिश्ते केवल जिम्मेदारियों को निभाने का नाम नहीं हैं। परिवार का भरण-पोषण जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है प्रेम, विश्वास और आपसी समझ। एक मजबूत परिवार वही होता है जहां सदस्य एक-दूसरे की भावनाओं को समझें और सुख-दुख में साथ खड़े रहें। लेकिन आज कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि लोग अपने ही रिश्तों से दूरी बनाने लगे हैं।
सबसे बड़ा कारण अक्सर समय की कमी को बताया जाता है। हालांकि कई सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि समय का अभाव पूरी तरह समस्या नहीं है। यदि परिवार के साथ थोड़ा समय भी गुणवत्तापूर्ण तरीके से बिताया जाए तो रिश्तों में मजबूती बनी रह सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब परिवार के बजाय अन्य चीजों को लगातार प्राथमिकता दी जाने लगती है।
बदलती तकनीक और सोशल मीडिया ने भी लोगों के व्यवहार को प्रभावित किया है। इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म पर लोग घंटों अनजान लोगों के साथ बातचीत में बिताते हैं, जबकि परिवार के सदस्यों के साथ संवाद कम होता जा रहा है। इससे रिश्तों में दूरी बढ़ने का खतरा पैदा होता है।
माता-पिता, जीवनसाथी और परिवार के अन्य सदस्य किसी भी व्यक्ति के जीवन की सबसे मजबूत नींव होते हैं। यदि इन्हीं रिश्तों के लिए समय न निकाला जाए तो भविष्य में भावनात्मक खालीपन बढ़ सकता है। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि यदि परिवार ने भी कभी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लिया होता, तो क्या कोई व्यक्ति अपने जीवन में आगे बढ़ पाता?
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं। यदि परिवार के सदस्य आपसी सम्मान, संवाद और सहयोग को महत्व देंगे तो अगली पीढ़ी भी रिश्तों को उसी तरह निभाना सीखेगी।
समाज के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती आधुनिकता और रिश्तों के बीच संतुलन बनाने की है। आधुनिक जीवन को अपनाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए रिश्तों की कीमत चुकाना उचित नहीं माना जा सकता। यदि परिवार के भीतर प्रेम, विश्वास और ईमानदारी बनी रहे तो रिश्तों की आत्मीयता भी बनी रहती है और जीवन अधिक सुखद बनता है।
समय रहते रिश्तों को मजबूत बनाने की दिशा में प्रयास करना जरूरी है। छोटी-छोटी बातचीत, साथ बिताए गए कुछ पल और एक-दूसरे के प्रति सम्मान ही परिवार को जोड़े रखने की सबसे बड़ी ताकत हैं।
काहू न कोई सुख दुःख कर दाता, निज कर्म कर भोग सब भ्राता”— यह संदेश हमें याद दिलाता है कि हमारे कर्म और हमारा व्यवहार ही हमारे जीवन और रिश्तों की दिशा तय करते हैं।

(लेखक,यूपी राज्य मुख्यालय का मान्यता प्राप्त पत्रकार है।)

VINAY PRAKASH SINGH
Author: VINAY PRAKASH SINGH

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