लखनऊ,22जुलाई(चौथा प्रहरी)। प्रतापगढ़ जिले के सांड़वा चंडिका गांव के युवा शिवम सिंह ने पशुपालन को कारोबार में बदलकर मिसाल पेश की है। परिवार ने कुछ साल पहले एक घायल देसी गाय की देखभाल से शुरुआत की थी। बाद में मिनी नंदिनी कृषक समृद्धि योजना के तहत ऋण मिलने से आधुनिक डेयरी शुरू हुई। आज उनके पास 25 गोवंश हैं और डेयरी से सालाना 20 लाख रुपये से अधिक की आय होने का दावा है। अब उनका अगला लक्ष्य ए2 दूध से बने उत्पादों का कारोबार बढ़ाना और अच्छी नस्ल की गायों का संवर्धन करना है।

गोसेवा से डेयरी कारोबार तक का सफर-शिवम सिंह के परिवार की शुरुआत किसी कारोबारी योजना से नहीं हुई थी। रास्ते में घायल मिली एक देसी गाय की देखभाल करते-करते परिवार का रुझान पशुपालन की ओर बढ़ा। समय के साथ गोवंश की संख्या बढ़ी और इसे व्यवस्थित डेयरी का रूप देने की सोच बनी।
इसी दौरान उन्हें मिनी नंदिनी कृषक समृद्धि योजना की जानकारी मिली। आवेदन के बाद उन्हें पांच लाख रुपये का ऋण मिला। इस राशि से उन्होंने आधुनिक डेयरी तैयार की और राजस्थान से साहीवाल तथा गिर नस्ल की गायें खरीदीं।
110 लीटर प्रतिदिन दूध उत्पादन-शिवम के अनुसार, उनकी डेयरी में इस समय करीब 110 लीटर दूध प्रतिदिन उत्पादन हो रहा है। इससे परिवार की आय में लगातार बढ़ोतरी हुई है। डेयरी के संचालन में आधुनिक तरीके अपनाए जा रहे हैं, जिससे पशुओं की देखभाल और उत्पादन दोनों में सुधार हुआ है।
उनका कहना है कि आगे कारोबार का विस्तार कर आसपास के लोगों के लिए भी रोजगार के नए अवसर तैयार किए जाएंगे।
अब ए2 दूध और वैल्यू एडेड उत्पादों पर नजर-शिवम अब केवल दूध बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहते। उनकी योजना ए2 दूध से घी और दूसरे दुग्ध उत्पाद तैयार कर बाजार में उतारने की है। साथ ही अच्छी देसी नस्लों के संरक्षण और नस्ल सुधार पर भी काम करने की तैयारी है।
पशुपालन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसान केवल कच्चा दूध बेचने के बजाय उससे जुड़े उत्पाद तैयार करें तो उनकी आय बढ़ सकती है।
ग्रामीण युवाओं के लिए एक उदाहरण-ग्रामीण इलाकों में रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं के लिए यह मॉडल एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। कम पैमाने से शुरू होकर डेयरी को बड़े कारोबार में बदला जा सकता है, बशर्ते पशुओं की अच्छी देखभाल, बेहतर नस्ल और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाए।
हालांकि, किसी भी डेयरी परियोजना की सफलता स्थानीय बाजार, पशु स्वास्थ्य, चारे की उपलब्धता और वित्तीय प्रबंधन पर भी निर्भर करती है।
भविष्य के निहितार्थ-यदि ऐसे मॉडल दूसरे जिलों में भी सफल होते हैं तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। देसी नस्ल की गायों के संरक्षण के साथ डेयरी आधारित छोटे उद्योग भी विकसित हो सकते हैं। ए2 दूध और उससे जुड़े उत्पादों की बढ़ती मांग किसानों के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकती है।
Author: VINAY PRAKASH SINGH
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