(विनय प्रकाश सिंह)
नीट परीक्षा को लेकर पिछले कुछ समय से देशभर में उठे विवाद ने एक बार फिर भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पेपर लीक के आरोपों, परीक्षा प्रक्रिया पर उठे सवालों और राजनीतिक दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी चर्चा का विषय बनी। इस पूरे घटनाक्रम ने बहस को केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि परीक्षा प्रणाली की कमियों को भी सामने ला दिया।

इस मामले में विपक्ष ने सरकार पर लगातार हमला बोला और इस्तीफे की मांग को प्रमुख मुद्दा बनाया। दूसरी ओर सरकार ने परीक्षा में गड़बड़ी रोकने के लिए कड़े कानून और सख्त कार्रवाई की बात कही। लेकिन शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई लोगों का मानना है कि केवल सख्त कानून बना देने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। जरूरत उस व्यवस्था को मजबूत करने की है, जहां पेपर लीक जैसी घटनाओं की संभावना ही कम हो जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए। यदि संस्था में प्रशासनिक या तकनीकी स्तर पर कमियां हैं तो उन्हें दूर किया जाए। जरूरत पड़े तो संस्था का पुनर्गठन किया जाए और परीक्षा संचालन के लिए स्थायी तथा अनुभवी अधिकारियों की नियुक्ति की जाए।
परीक्षा प्रणाली को लेकर कई सुझाव भी सामने आए हैं। पहला सुझाव यह है कि नीट जैसी बड़ी परीक्षा एक ही चरण में कराने के बजाय दो चरणों में आयोजित की जाए। पहले चरण में प्रारंभिक परीक्षा हो और उसके बाद मुख्य परीक्षा ली जाए। इससे केवल गंभीर और योग्य अभ्यर्थी अंतिम चरण तक पहुंचेंगे और एक ही परीक्षा पर पूरा भविष्य निर्भर नहीं रहेगा।
दूसरा सुझाव राज्यों और अखिल भारतीय स्तर की सीटों को लेकर है। कई शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अखिल भारतीय कोटे के लिए अलग परीक्षा और राज्यों की सीटों के लिए अलग परीक्षा मॉडल पर भी विचार किया जा सकता है। इससे राज्यों की अलग-अलग परिस्थितियों और मेरिट सूची से जुड़ी कई समस्याओं को कम किया जा सकता है।
तीसरा महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि यदि परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद भी नकल या पेपर लीक के पुख्ता प्रमाण मिलते हैं तो दोबारा परीक्षा कराने का स्पष्ट नियम होना चाहिए। इसके साथ संदिग्ध मामलों में चयनित अभ्यर्थियों की पुनः परीक्षा लेकर निष्पक्ष जांच की जा सकती है। इससे परीक्षा में गड़बड़ी करने वालों पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनेगा।
एक और राय यह है कि जिस संस्था को परीक्षा कराने की जिम्मेदारी दी जाए, उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। परीक्षा में गंभीर गड़बड़ी सामने आने पर संस्था की प्रशासनिक जिम्मेदारी तय की जाए। इससे परीक्षा संचालन में लापरवाही की गुंजाइश कम होगी।
शिक्षा विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का उद्देश्य योग्य अभ्यर्थियों का चयन करना है। इसलिए यदि चयन प्रक्रिया कई चरणों में होगी तो परिणाम अधिक भरोसेमंद होंगे। इससे किसी एक दिन की तकनीकी गड़बड़ी या अनियमितता का असर भी कम पड़ेगा।
आगे क्या?
नीट विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश की बड़ी परीक्षाओं में पारदर्शिता और भरोसा बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। राजनीतिक बहस अपने स्थान पर है, लेकिन लंबे समय के समाधान के लिए परीक्षा प्रणाली में तकनीकी सुधार, मजबूत निगरानी और स्पष्ट जवाबदेही जरूरी होगी। यदि इन पहलुओं पर गंभीरता से काम किया जाता है तो भविष्य में ऐसे विवादों की संभावना कम हो सकती है और छात्रों का भरोसा भी मजबूत होगा।
Author: VINAY PRAKASH SINGH
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